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Jazz

जैज़ नृत्य , [1]  नृत्य शैलियों की व्यापक श्रृंखला द्वारा सामान रूप से प्रयोग किया जाने वाला एक वर्गीकरण है। 1950 के दशक से पहले, जैज़ नृत्य उन शैलियों को इंगित करता था जो अफ्रीकन अमेरिकन देशी नृत्यों से उपत्पन्न हुए होते थे। 1950 के दशक में, जैज़ नृत्य की एक नयी विधा- आधुनिक जैज़ नृत्य  -अस्तित्व में आई. जैज़ नृत्य की प्रत्येक पृथक शैली की जड़ें इन दोनों विशिष्ट स्रोतों में से ही किसी एक में पायी जाती हैं। परंपरागत 1950 के मध्य तक, जैज़ नृत्य उन शैलियों को इंगित करता था जो 19वीं सदी के उत्तरार्ध से 20वीं सदी के मध्य के अफ्रीकन अमेरिकन देशी नृत्यों से उपत्पन्न हुए थे। जैज़ नृत्य को अक्सर टैप नृत्य कहा जाता था क्योंकि  जैज़ संगीत  की धुनों पर टैप नृत्य, उस समय का लोकप्रिय नृत्य था। समय के साथ जैज़ नृत्य से विकसित होकर विविध श्रेणियों के सामाजिक तथा नृत्य नाटिकाओं का जन्म हुआ। जैज़ काल के बाद के दिनों में जैज़ नृत्य के लोकप्रिय रूपों में केकवॉक, ब्लैकबॉटम, चार्ल्सटन, जिटरबग, बूगी वूगी, स्विंग तथा इसी से सम्बंधित लिंडी हॉप सम्मिलित थे। आज, इनमें से कई नृत्य ...
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ओड़िसी

  ओड़िसी  ओडिशाप्रांत भारत की एक शास्त्रीय नृत्य शैली है। अद्यतन काल में गुरु केलुचरण महापात्र ने इसका पुनर्विस्तार किया।ओडिसी नृत्य को पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर सबसे पुराने जीवित नृत्य रूपों में से एक माना जाता है। इसका जन्म मन्दिर में नृत्य करने वाली देवदासियों के नृत्य से हुआ था। ओडिसी नृत्य का उल्लेख शिलालेखों में मिलता है। इसे ब्रह्मेश्वर मन्दिर के शिलालेखों में दर्शाया गया है।  संयुक्ता पाणिग्रही (24 अगस्त 1944 – 24 जून 1997) [1] भारत की एक नृत्यांगना थीं जो ओड़िसी नृत्य के लिये प्रसिद्ध हैं। ओड़िसी नृत्य के क्षेत्र में आने वाली वे पहली उड़िया महिला थीं। उन्होने कम आयु में ही ओड़िसी नृत्य सीचना शुरू किया और इस नृत्य को पुनर्जीवन प्रदान किया। ओडिसी नृत्य को पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर सबसे पुराने जीवित नृत्य रूपों में से एक माना जाता है। इसका जन्म मन्दिर में नृत्य करने वाली  देवदासियों  के नृत्य से हुआ था। ओडिसी नृत्य का उल्लेख  शिलालेखों  में मिलता है। इसे  ब्रह्मेश्वर मन्दिर  के शिलालेखों में दर्शाया गया है।   ओडिसी...

नृत्य

भारतीय नृत्य   नृत्य भी मानवीय अभिव्यक्तियों का एक रसमय प्रदर्शन है। यह एक सार्वभौम कला है, जिसका जन्म मानव जीवन के साथ हुआ है। बालक जन्म लेते ही रोकर अपने हाथ पैर मार कर अपनी भावाभिव्यक्ति करता है कि वह भूखा है- इन्हीं आंगिक -क्रियाओं से नृत्य की उत्पत्ति हुई है। यह कला देवी-देवताओं- दैत्य दानवों- मनुष्यों एवं पशु-पक्षियों को अति प्रिय है। भारतीय पुराणों में यह दुष्ट नाशक एवं ईश्वर प्राप्ति का साधन मानी गई है। अमृत मंथन के पश्चात जब दुष्ट राक्षसों को अमरत्व प्राप्त होने का संकट उत्पन्न हुआ तब भगवान विष्णु ने मोहिनी का रूप धारण कर अपने लास्य नृत्य के द्वारा ही तीनों लोकों को राक्षसों से मुक्ति दिलाई थी। इसी प्रकार भगवान शंकर ने जब कुटिल बुद्धि दैत्य भस्मासुर की तपस्या से प्रसन्न होकर उसे वरदान दिया कि वह जिसके ऊपर हाथ रखेगा वह भस्म हो जाए- तब उस दुष्ट राक्षस ने स्वयं भगवान को ही भस्म करने के लिये कटिबद्ध हो उनका पीछा किया- एक बार फिर तीनों लोक संकट में पड़ गये थे तब फिर भगवान विष्णु ने मोहिनी का रूप धारण कर अपने मोहक सौंदर्यपूर्ण नृत्य से उसे अपनी ओर आकृष्ट कर उसका वध किया। भा...

मणिपुरी

मणिपुरी  नृत्य भारत का प्रमुख शास्त्रीय नृत्य है। इसका नाम इसकी उत्पत्तिस्थल (मणिपुर) के नाम पर पड़ा है। यह नृत्य मुख्यतः हिन्दू वैष्णव प्रसंगों पर आधारित होता है जिसमें राधा और कृष्ण के प्रेम प्रसंग प्रमुख है। मणिपुरी नृत्‍य भारत के अन्‍य नृत्‍य रूपों से भिन्‍न है। इसमें शरीर धीमी गति से चलता है, सांकेतिक भव्‍यता और मनमोहक गति से भुजाएँ अंगुलियों तक प्रवाहित होती हैं। यह नृत्‍य रूप 18वीं शताब्‍दी में वैष्‍णव सम्‍प्रदाय के साथ विकसित हुआ जो इसके शुरूआती रीति रिवाज और जादुई नृत्‍य रूपों में से बना है। विष्‍णु पुराण, भागवत पुराण तथा गीतगोविन्द की रचनाओं से आई विषयवस्तुएँ इसमें प्रमुख रूप से उपयोग की जाती हैं। मणिपुर की मीतई जनजाति की दंतकथाओं के अनुसार जब ईश्‍वर ने पृथ्‍वी का सृजन किया तब यह एक पिंड के समान थी। सात लैनूराह ने इस नव निर्मित गोलार्ध पर नृत्‍य किया, अपने पैरों से इसे मजबूत और चिकना बनाने के लिए इसे कोमलता से दबाया। यह मीतई जागोई का उद्भव है। आज के समय तक जब मणिपुरी लोग नृत्‍य करते हैं वे कदम तेजी से नहीं रखते बल्कि अपने पैरों को भूमि पर कोमलता और मृदुता के साथ रखते हैं...

कथकली

कथकली मालाबार, कोचीन और त्रावणकोर के आस पास प्रचलित नृत्य शैली है। केरल की सुप्रसिद्ध शास्त्रीय रंगकला है कथकली। 17 वीं शताब्दी में कोट्टारक्करा तंपुरान (राजा) ने जिस रामनाट्टम का आविष्कार किया था उसी का विकसित रूप है कथकली। यह रंगकला नृत्यनाट्य कला का सुंदरतम रूप है। भारतीय अभिनय कला की नृत्य नामक रंगकला के अंतर्गत कथकली की गणना होती है। रंगीन वेशभूषा पहने कलाकार गायकों द्वारा गाये जानेवाले कथा संदर्भों का हस्तमुद्राओं एवं नृत्य-नाट्यों द्वारा अभिनय प्रस्तुत करते हैं। इसमें कलाकार स्वयं न तो संवाद बोलता है और न ही गीत गाता है। कथकली के साहित्यिक रूप को 'आट्टक्कथा' कहते हैं। गायक गण वाद्यों के वादन के साथ आट्टक्कथाएँ गाते हैं। कलाकार उन पर अभिनय करके दिखाते हैं। कथा का विषय भारतीय पुराणों और इतिहासों से लिया जाता है। आधुनिक काल में पश्चिमी कथाओं को भी विषय रूप में स्वीकृत किया गया है। कथकली में तैय्यम, तिरा, मुडियेट्टु, पडयणि इत्यादि केरलीय अनुष्ठान कलाओं तथा कूत्तु, कूडियाट्टम, कृष्णनाट्टम आदि शास्त्रीय (क्लासिक)कलाओं का प्रभाव भी देखा जा सकता है। रंगमंच   कथकली का रंगमंच ज़म...

कुचीपुडी

कूचिपूड़ी (तेलुगू : కూచిపూడి) आंध्र प्रदेश, भारत की प्रसिद्ध  नृत्य शैली है। यह पूरे दक्षिण भारत में मशहूर है। इस नृत्य का नाम कृष्णा जिले के दिवि तालुक में स्थित कुचिपुड़ी गाँव के ऊपर पड़ा, जहाँ के रहने वाले ब्राह्मण इस पारंपरिक नृत्य का अभ्यास करते थे। परम्‍परा के अनुसार कुचिपुडी़ नृत्‍य मूलत: केवल पुरुषों द्वारा किया जाता था और वह भी केवल ब्राह्मण समुदाय के पुरुषों द्वारा। ये ब्राह्मण परिवार कुचिपुडी़ के भागवतथालू कहलाते थे। कुचिपुडी़ के भागवतथालू ब्राह्मणों का पहला समूह 1502 ईसवी के आसपास निर्मित किया गया था। उनके कार्यक्रम देवताओं को समर्पित किए जाते थे। प्रचलित कथाओं के अनुसार कुचिपुड़ी नृत्य को पुनर्परिभाषित करने का कार्य सिद्धेन्द्र योगी नामक एक कृष्ण-भक्त संत ने किया था।[1][2] कूचिपूड़ी के पंद्रह ब्राह्मण परिवारों ने पांच शताब्दियों से अधिक समय तक परम्‍परा को आगे बढ़ाया है। प्रतिष्ठित गुरु जैसे वेदांतम लक्ष्‍मी नारायण, चिंता कृष्‍णा मूर्ति और ता‍देपल्‍ली पेराया ने महिलाओं को इसमें शामिल कर नृत्‍य को और समृद्ध बनाया है। डॉ॰ वेमापति चिन्‍ना सत्‍यम ने इसमें कई नृत्‍य नाटिकाओ...

B. & K. different kya hai???

भरतनाट्यम क्या है | What is Bharatnatyam   भरतनाट्यम एक सबसे प्राचीन नृत्य शैली है जो 400 ईसा पूर्व की है. ये भरत मुनि के नाट्य शास्त्र पे आधारित है जिसे दक्षिण भारत के देवदासियों द्वारा विकसित व प्रसारित किया गया था. दक्षिण भारत में ये मुख्य रूप से तमिलनाडु का लोकनृत्य है. इसे तमिलनाडु की महिलों द्वारा चलाया जा रहा है और इस नृत्य का प्रेरणास्त्रोत चिदंबरम के प्राचीन मंदिर की मूर्तियों से है. शुरुआत में इसे उतना सम्मान नहीं मिला जब ये देवदासियों द्वारा प्रचारित हो रहा था लेकिन बाद में बीसवी सदी के शुरू में ई. कृष्ण अय्यर और रुकीमणि देवी के प्रयासों द्वारा इस नृत्य को भरपूर सम्मान मिला और अब ये एक जाना माना नृत्य है. कत्थक क्या है | What is Kathak   कत्थक का अर्थ है कथा को थिरकते हुए कहना। ये एक प्राचीन नृत्य शैली है जो उत्तरी भारत में उतपन्न हुई. ये उत्तर प्रदेश और राजस्थान का शास्त्रीय नृत्य है. जो महाभारत के युग से चला आ रहा है. सबसे पहले इसका प्रयोग महाभारत में सुनने को मिला और बाद में ये मुसलमानो के मनोरंजन के लिए प्रयोग किये जाने वाला नृत्य बना दिया गया. लेकिन वर्तमा...